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जयेष्ठ शुकल निर्जला एकादशी महात्मः Nirjala Ekadashi इस कलियुग में एकादशी महात्म का पाठ करना और सुनने से सब पापों से मुक्ति मिलती है और वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति भी होती है ,इस पाठ को पड़ने और सुनने से जो आनन्द प्राप्त होता है ,उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ,

कर्म तीन प्रकार के होते सात्विक, राजसिक,और तामसिक ,इस तीनो में सात्विक भाव सबसे उत्तम माना जाता है ,जिस वियक्ति के मन में सात्विक भाव आ जाये तो उसके हृदय में सद्गुणों की वृद्धि देखने को मिलती है उसका सवभाव आध्यात्मिक होने लगता है , ईश्वर की भगति उसके मन में प्रकट होने लगती है ,


जयेष्ठ शुकल निर्जला एकादशी


एकादशी महात्म
एकादशी व्रत करने वाले के पितृ कुयोनि को त्याग कर स्वर्ग में चले जाते है ,एकादशी व्रत करने वाले भगत के भगवन वासुदेव की कृपा से ,दूध ,पुत्र ,धन और सामाजिक मान कीर्ति में वृद्धि होती है

किसी निर्धन को भूमि दान , अन्न दान , स्वर्ण दान , और गौ दान से जो पुण्य प्राप्त होता है उन सबसे ज्यादा पुण्य एकादशी व्रत रखने से प्राप्त होता है ईश्वर की भगति और ईश्वर का प्रचार करना , गुणों का व्याख्यान करना दोनों मुक्ति दायक है

धन दान देने की अपेक्षा किसी दुखी निर्धन निर्वल को ईश्वर की भगति का मार्ग दिखा देना ज्यादा उत्तम है , आपके द्वारा दिया गया धन उसको कुछ समय के लिए सुखी करता है लेकिन अगर मन में ईश्वर की भगति प्रकट हो जाये तो जन्मो जन्मो के दुःख संताप और दरिद्रता मिट जाती है.

आप भी इस लेख में बताये गए निर्जला एकादशी महात्म को 11 लोगों में शेयर करें आपके द्वारा किया गया ये पुण्य कर्म निरंतर बढ़ता ही जायेगा.



जयेष्ठ शुकल निर्जला एकादशी महात्मः -
एक बार भीमसेन व्याकुल होकर व्यास मुनि के पास गए ,भीमसेन बोले हे मुनिवर मेरी दुविधा का कोई उचित मार्ग बतलाये
मेरी माता कुंती , भ्राता युधिष्टर तथा अर्जुन ,नकुल सहदेव, द्रोपदी सभी एकादशी का व्रत करते है , भी उपदेश देते है की तुम भी एकादशी का व्रत किया करो एकादशी को अन्न ग्रहण मत किया करो !

मुनिवर अब आप बतलाइये मई क्या करूँ मेरे उदर में अगर अन्न नहीं जायेगा तो ज्वाला मेरी शरीर की चर्बी को खा जाएगी। इस देह की रक्षा करना मनुष्य का प्रथम कर्तव्य है ,एकादशी हर 15 दिन बाद आ जाती है , मेरी भूख इतनी ज्यादा है ,मैं कुछ खाये बिना रह नहीं सकता ,मुझे कोई ऐसा मार्ग बतलायें जिससे साल में एक बार व्रत करने से पुरे साल का फल मिल जाये मुझे कोई ऐसा मार्ग बतलायें जो सब पापों से मुक्ति दिलाने वाला हो और मृत्यु उपरान्त मोक्ष प्राप्त हो जाये .

व्यास मुनि बोले :-
हे आर्य पुत्र तुम जेष्ठ शुकल पक्ष की निर्जला एकादशी का व्रत विधि पूर्वक करो ,जो जन निर्जला एकादशी का व्रत श्रद्धा पूर्वक करता है एकदाशिओं का फल मिलता है वह बैकुण्ठ जाने का अधिकारी हो जाता है , पितरों के निमित पंखा ,छाता , कपडे, ,जूता , धन ,मिटटी का घड़ा और फल इत्यादि का दान करना मीठे जल का प्याऊ लगाना ,सुबह शाम ,ॐ नमः भगवते वासुदेवाय , द्वादस अखर वाले महा मन्त्र का जाप करना .

व्यास जी बोले अगर आप फलाहारी रह कर इस व्रत को करते है ,ध्रुव की तपस्या के फल के एक दिन के बराबर आपको पुण्य मिलेगा।

पवन आहारी  रह कर निर्जला एकादशी का व्रत रखते है तो आपको ध्रुव की तपस्या के छह मॉस की तपस्या का फल मिलता है।

निर्जला एकादशी नियम और निषेध :-
विष्णु विरोधी का संग न करे ,नास्तिक से दूर रहे, क्रोध का त्याग करें सत्य बोलें जिनके मुख में वासुदेव के द्वादश महा मन्त्र का जाप रहता है और भगवन वासुदेव के स्वरुप का ध्यान करते है ,उन्हें निर्जला एकादशी का पूर्ण फल मिलता है ,सारा दिन भजन करें रात्रि में वासुदेव के चरित्रों पढ़ना और सुनना जागरण करना चाहिए ,

संसार के प्रत्येक जीव में ईश्वर की अनुभूति करें , ईश्वर का अंश माने ,मन कर्म वचन से किसी जीव को दुःख न पहुंचाएं ,निर्जला एकादशी व्रत करने से  तथा द्वादश महामंत्र का जाप लगातार एक वर्ष तक करने से ,पितृ दोष से मुक्ति तो मिलती है  साथ में तीसरा नेत्र ( दिव्य चक्षु )भी खुलने लगता है अंतर् मन में ईश्वर का प्रकाश प्रकट होने लगता है ,अज्ञानता का पर्दा छट जाता है मन मंदिर में ईश्वर का साक्षात्कार हो जाता है


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